Tuesday, December 13, 2011

Wo... continued...

एक डोर के सहारे उडती फिरती हैं खुले आसमान में...
तो कभी कटी पतंग सी अनजान रास्तों में खो जाती हैं वो !

छुवो तो लगती हैं रुई की फाहों सी मखमली मुलायम...
तो कभी पत्थरों की मूरत से बेजान बनी जाती हैं वो !

झरनों सी बहती हैं, बेफिक्र सी कभी कभी...
तो ठहरे पानी स़ी शांत नीरस स़ी बन जाती हैं !

मुस्कुराती हैं तो जल उठते हैं हजारों दीये...
उदास होती हैं तो... बादलों को भी नम कर जाती हैं वो !

हैं मौसम कई... हैं रंग सभी... छुपे हुए इसकी आँचल के तले...
कभी समेटती हैं तो कभी बिखेरती जाती हैं वो !

हैं नादान थोड़ी स़ी और हैं ज़रा स़ी बुद्धू...
छुपाती हैं और सब समझ जाती हैं वो !

सोचता हूँ कभी की रोक लूँगा उसे मैं एक दिन...
"बहुत नादान हैं" कहती हैं... और मुझे छोड़ जाती हैं वो !

बंद मुट्ठी से रेत की तरह फिसलती जाती हैं वो... मेरी जिंदगी !!