Sunday, January 1, 2012

नया साल...

समय ना तो रुकता हैं... ना ही थकता हैं
एक चक्र हैं ज़िन्दगी का बस चलता रहता हैं!
एक और बरस बीत गया... नए साल ने फिर दस्तक दी...
कुछ बदलने की उम्मीद में... सबने तालिकाएँ(कैलेंडर) बदल दी!

दूरियाँ हो कम ज़रा सी.. इजाफा हो ज़रा प्यार में..
हैं कुछ और भी चीजें... बदलने की आसार में...
ये सोच के पंछी रुक गए... सुबह की इंतज़ार में!

रास्तें...रिश्तें और कुछ सीढियां...
जिनसे हो के गुज़रे थे मुसाफिर कभी...
वो नहीं बदले इस मौसमी बयार में !

कुछ सिक्के हमने भी उछालें थे तेरे दर पे...
अब तक बैठा हूँ... तेरे दीदार-ए-इंतज़ार में !!

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